🇮🇳🇺🇸 भारत–अमेरिका ट्रेड डील पर बड़ा विवाद: ‘शर्म का दस्तावेज़’ बताकर विपक्ष ने उठाए गंभीर सवाल
भारत और अमेरिका के बीच हुई नई ट्रेड डील को लेकर सियासी गलियारों में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। विपक्ष और कई विशेषज्ञों ने इस समझौते को “बराबरी से कोसों दूर” बताते हुए इसे भारत के हितों के खिलाफ करार दिया है।
आलोचकों का कहना है कि पहले संयुक्त राज्य अमेरिका भारत पर मात्र 2–3 प्रतिशत टैरिफ लगाता था, जबकि अब यह बढ़कर 18 प्रतिशत कर दिया गया है। इसे भारत के निर्यातकों के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है।
🇺🇸 अमेरिका को गारंटी, भारत को नहीं
सबसे बड़ा विवाद इस बात को लेकर है कि अमेरिका यह स्पष्ट गारंटी नहीं दे रहा कि वह भारत से कितने मूल्य का माल खरीदेगा। इसके उलट, भारत ने अमेरिका से 500 बिलियन डॉलर का सामान खरीदने की गारंटी दी है।
विशेषज्ञ सवाल उठा रहे हैं कि क्या यह सौदा एकतरफा नहीं है?
🇷🇺 रूस को लेकर रणनीतिक स्वायत्तता पर सवाल
इस डील का एक और संवेदनशील पहलू रूस से जुड़ा है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या रूस के मसले पर भारत ने अपनी रणनीतिक स्वायत्तता से समझौता किया है?
भारत की पारंपरिक विदेश नीति गुटनिरपेक्षता और संतुलन पर आधारित रही है, ऐसे में यह चिंता और गहरी हो जाती है।
🏛️ मंत्रियों के जवाबों में विरोधाभास
मामला यहीं नहीं थमता। मोदी सरकार के दो मंत्री इस मुद्दे पर एक-दूसरे पर जवाब टालते नजर आ रहे हैं। वहीं एक तीसरे अहम मंत्री, जिनसे सबसे पहले जवाब अपेक्षित था, वे पूरे मामले में खामोश हैं।
इस चुप्पी ने संदेह को और बढ़ा दिया है।
❓ जनता के सामने कई बड़े सवाल
क्या यह ट्रेड डील भारत के आर्थिक हितों की रक्षा करती है?
क्या टैरिफ बढ़ोतरी से भारतीय उद्योग को नुकसान होगा?
क्या रूस के मुद्दे पर भारत की स्वतंत्र विदेश नीति कमजोर पड़ी है?
और आखिर, जिम्मेदार मंत्री जवाब देने से क्यों बच रहे हैं?
इन सभी सवालों के बीच, इस डील पर बहस तेज होती जा रही है। सरकार से स्पष्ट और पारदर्शी जवाब की मांग लगातार बढ़ रही है।
जनता अब जानना चाहती है कि यह समझौता भारत के लिए अवसर है या समझौता (Compromise)।
