महोबा में विधायक निधि के कामों पर सवाल: ठेकेदारों की मनमानी या निगरानी तंत्र की नाकामी?
करोड़ों के विकास कार्यों की गुणवत्ता कठघरे में, पेटी ठेकेदारी के आरोपों से उठे सवाल; शिकायतों के निस्तारण और जिम्मेदारों की जवाबदेही की जांच जरूरी
महोबा। जनता की गाढ़ी कमाई से मिलने वाली विधायक निधि का उद्देश्य गांवों और शहरों में बुनियादी सुविधाओं को मजबूत करना है। इस राशि से सड़कें, नालियां, सीसी रोड, इंटरलॉकिंग और अन्य जनहित के निर्माण कार्य कराए जाते हैं, ताकि आम लोगों को राहत मिल सके। लेकिन उत्तर प्रदेश के महोबा जिले में विधायक निधि से कराए गए कुछ निर्माण कार्यों की गुणवत्ता, ठेकेदारी की प्रक्रिया और शिकायतों के निस्तारण को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। आरोप हैं कि कई कार्यों में ठेकेदारों ने पहले खुद ठेका लिया और बाद में काम पेटी ठेकेदारों को सौंप दिया। इससे निर्माण की गुणवत्ता और सरकारी धन के सदुपयोग पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
स्थानीय स्तर पर समय-समय पर निर्माण कार्यों की गुणवत्ता को लेकर शिकायतें उठने और खबरें प्रकाशित होने के बावजूद यदि उन्हीं समस्याओं की पुनरावृत्ति हो रही है, तो यह केवल निर्माण एजेंसी की कार्यप्रणाली का मामला नहीं रह जाता। सवाल निगरानी व्यवस्था, तकनीकी जांच, भुगतान प्रक्रिया और शिकायतों के वास्तविक निस्तारण तक पहुंचता है। हालांकि, इन आरोपों की पुष्टि के लिए संबंधित कार्यों के अभिलेख, स्थलीय निरीक्षण और विभागीय जांच आवश्यक है।
पेटी ठेकेदारी के आरोप, जिम्मेदारी किसकी?
विधायक निधि से कराए जाने वाले निर्माण कार्यों में स्वीकृति से लेकर भुगतान तक निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए। कार्य की लागत, निर्माण एजेंसी, तकनीकी मानक, कार्यादेश, समयसीमा और गुणवत्ता जांच जैसे बिंदु महत्वपूर्ण होते हैं। आरोप है कि महोबा में कुछ कार्यों में मूल ठेकेदार ने जिम्मेदारी लेने के बाद काम दूसरे ठेकेदार को सौंप दिया। यदि ऐसा हुआ है, तो यह जांच का विषय है कि संबंधित अनुबंध में इसकी अनुमति थी या नहीं और निर्माण की गुणवत्ता सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी किस अधिकारी अथवा संस्था की थी।
पेटी ठेकेदारी अपने आप में हर परिस्थिति में अनियमितता का प्रमाण नहीं है, लेकिन यदि इसके कारण निर्धारित मानकों की अनदेखी हुई, निर्माण में घटिया सामग्री लगाई गई या जिम्मेदारियों से बचने की कोशिश की गई, तो जवाबदेही तय करना जरूरी है। निर्माण की गुणवत्ता से समझौता होने पर सबसे अधिक नुकसान उस जनता को उठाना पड़ता है, जिसके लिए ये कार्य स्वीकृत किए जाते हैं।
एक-दो साल में ही निर्माण की हालत खराब होने का आरोप
स्थानीय स्तर पर कुछ निर्माण कार्यों को लेकर यह सवाल उठाया जा रहा है कि जिन सड़कों, नालियों और अन्य संरचनाओं पर सरकारी धन खर्च किया गया, वे अपेक्षित अवधि तक टिकाऊ क्यों नहीं रह पाईं। आरोप है कि कुछ स्थानों पर निर्माण की गुणवत्ता इतनी कमजोर रही कि एक-दो वर्ष के भीतर ही मरम्मत या दोबारा निर्माण की जरूरत महसूस होने लगी।
यदि किसी निर्माण में तय मानकों के अनुरूप सामग्री और तकनीक का इस्तेमाल किया गया है, तो उसकी गुणवत्ता का आकलन संबंधित कार्य की प्रकृति, स्वीकृत डिजाइन, तकनीकी विनिर्देश और निर्धारित अवधि के आधार पर किया जाना चाहिए। केवल सतह पर दरारें दिखने या निर्माण टूटने से भ्रष्टाचार का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। इसके लिए तकनीकी विशेषज्ञों से जांच, सामग्री की गुणवत्ता का परीक्षण और निर्माण के समय तैयार किए गए अभिलेखों का मिलान आवश्यक है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिन कार्यों में गुणवत्ता को लेकर शिकायतें हैं, क्या उनका स्वतंत्र तकनीकी परीक्षण कराया गया? क्या दोष मिलने पर ठेकेदारों से मरम्मत कराई गई? क्या किसी कार्य में भुगतान रोकने, वसूली करने या अनुबंध संबंधी कार्रवाई की नौबत आई? इन सवालों के जवाब संबंधित विभागों के रिकॉर्ड से ही सामने आ सकते हैं।
शिकायतें दर्ज, लेकिन क्या मौके पर बदली तस्वीर?
जिले में विकास कार्यों की गुणवत्ता को लेकर समय-समय पर शिकायतें और खबरें सामने आने की बात कही जा रही है। आरोप है कि शिकायतों का निस्तारण कागजी कार्रवाई तक सीमित रह जाता है और धरातल पर स्थिति में अपेक्षित बदलाव नहीं दिखाई देता। यदि शिकायतकर्ता को केवल निस्तारण की सूचना दे दी जाए, लेकिन निर्माण की गुणवत्ता में सुधार न हो, तो शिकायत निवारण व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
किसी भी शिकायत का वास्तविक निस्तारण तभी माना जाना चाहिए, जब आरोपों की निष्पक्ष जांच हो, संबंधित स्थल का निरीक्षण किया जाए, शिकायतकर्ता के तथ्यों का परीक्षण हो और कार्रवाई का स्पष्ट विवरण उपलब्ध कराया जाए। यदि शिकायत में निर्माण की गुणवत्ता का मुद्दा है, तो केवल संबंधित अधिकारी की रिपोर्ट पर्याप्त है या स्वतंत्र तकनीकी जांच भी जरूरी है—यह भी मामले की प्रकृति के अनुसार तय किया जाना चाहिए।
इस पूरे प्रकरण में शिकायतों की तारीख, संबंधित निर्माण का स्थान, स्वीकृत धनराशि, कार्यदायी संस्था, जांच अधिकारी की रिपोर्ट और निस्तारण आदेशों का मिलान महत्वपूर्ण होगा। इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि शिकायतों पर वास्तव में कार्रवाई हुई या केवल औपचारिकता पूरी की गई।
करोड़ों के कार्य, मगर हिसाब-किताब की पड़ताल जरूरी
विधायक निधि के तहत कराए गए निर्माण कार्यों में सरकारी धन के उपयोग की जांच के लिए प्रत्येक परियोजना का अलग-अलग लेखा-जोखा खंगालना जरूरी है। स्वीकृत राशि और वास्तविक खर्च के बीच अंतर, कार्यादेश में दर्ज मात्रा, मौके पर मौजूद निर्माण की लंबाई-चौड़ाई, इस्तेमाल की गई सामग्री और भुगतान किए गए बिल—इन सभी का मिलान किए बिना किसी वित्तीय अनियमितता पर अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
जांच में यह भी देखना चाहिए कि संबंधित निर्माण की प्रशासनिक स्वीकृति और तकनीकी स्वीकृति कब जारी हुई, अनुमान किस आधार पर तैयार किया गया, माप पुस्तिका में कितना काम दर्ज है और भुगतान किस अधिकारी की संस्तुति पर हुआ। यदि मौके पर काम कम मिला, लेकिन अभिलेखों में अधिक मात्रा दर्ज है, तो यह गंभीर अनियमितता का संकेत हो सकता है। इसी तरह, निर्धारित मानकों से कम सामग्री का इस्तेमाल पाए जाने पर जिम्मेदार ठेकेदार और संबंधित अधिकारियों की भूमिका की जांच आवश्यक होगी।
हालांकि, जिले में विधायक निधि के नाम पर करोड़ों रुपये के बंदरबांट का आरोप लगाने से पहले परियोजनावार वित्तीय अभिलेखों और प्रमाणों का सत्यापन जरूरी है। पारदर्शी जांच ही यह स्पष्ट कर सकती है कि कहां लापरवाही हुई, कहां नियमों का उल्लंघन हुआ और कहां आरोप तथ्यहीन हैं।
सदर विधायक और अधिकारियों की जवाबदेही पर सवाल
विकास कार्यों की स्वीकृति और उनके क्रियान्वयन की प्रक्रिया में अलग-अलग संस्थाओं और अधिकारियों की भूमिकाएं निर्धारित होती हैं। विधायक निधि से प्रस्तावित कार्यों के संदर्भ में जनप्रतिनिधि की भूमिका, कार्यदायी संस्था की जिम्मेदारी और तकनीकी अधिकारियों की निगरानी को अलग-अलग समझना आवश्यक है। किसी निर्माण में कमी पाए जाने मात्र से किसी जनप्रतिनिधि या अधिकारी की मिलीभगत साबित नहीं होती।
इसके बावजूद, यदि किसी क्षेत्र में लगातार गुणवत्ता संबंधी शिकायतें आ रही हैं, तो संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगना और जांच की प्रगति सार्वजनिक करना प्रशासनिक जवाबदेही का हिस्सा है। महोबा में जिन निर्माण कार्यों को लेकर सवाल उठ रहे हैं, उनकी सूची तैयार कर संबंधित विभाग से यह जानकारी मांगी जानी चाहिए कि कितने कार्य पूरे हुए, कितने की गुणवत्ता जांच हुई, कितनों में कमी मिली और कितने मामलों में कार्रवाई की गई।
सदर विधायक की ओर से इन विशिष्ट आरोपों पर कोई प्रतिक्रिया उपलब्ध होने पर उसे भी खबर में शामिल किया जाना चाहिए। इसी प्रकार संबंधित कार्यदायी संस्थाओं और जिला प्रशासन का पक्ष सामने आना जरूरी है, ताकि पूरे मामले की तस्वीर एकतरफा आरोपों के बजाय तथ्यों के आधार पर स्पष्ट हो सके।
जांच के दायरे में आने चाहिए ये प्रमुख बिंदु
विधायक निधि से कराए गए संदिग्ध निर्माण कार्यों की निष्पक्ष जांच में कम से कम छह बिंदुओं को शामिल किया जाना चाहिए।
पहला, संबंधित कार्यों की स्वीकृत धनराशि और कार्यादेश की प्रति सार्वजनिक की जाए। दूसरा, माप पुस्तिका यानी एमबी में दर्ज काम का मौके पर भौतिक सत्यापन कराया जाए। तीसरा, सड़क, नाली और अन्य निर्माणों में इस्तेमाल सामग्री के नमूने लेकर जरूरत के अनुसार प्रयोगशाला में परीक्षण कराया जाए। चौथा, मूल ठेकेदार और कथित पेटी ठेकेदार की भूमिका तथा अनुबंध की शर्तों की जांच हो। पांचवां, निर्माण पूरा होने के बाद किए गए निरीक्षण और भुगतान की प्रक्रिया का परीक्षण किया जाए। छठा, पूर्व में प्राप्त शिकायतों और उनके निस्तारण आदेशों का स्वतंत्र रूप से सत्यापन कराया जाए।
यदि जांच में अनियमितता सामने आती है, तो नियमों के अनुसार जिम्मेदार पक्षों पर कार्रवाई, आवश्यक वसूली और खराब निर्माण को दुरुस्त कराने की प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए। वहीं, आरोपों की पुष्टि नहीं होने पर तथ्यों के आधार पर स्थिति स्पष्ट की जानी चाहिए।
जनता के पैसे का हिसाब जनता को मिले
विधायक निधि का प्रत्येक रुपया सार्वजनिक हित के लिए खर्च होता है। इसलिए इसके तहत कराए गए कार्यों की गुणवत्ता और वित्तीय पारदर्शिता सुनिश्चित करना संबंधित व्यवस्था की जिम्मेदारी है। सड़क टूटने, नाली धंसने या निर्माण के समय से पहले खराब होने की शिकायतों को सामान्य समस्या मानकर टालना उचित नहीं होगा। प्रत्येक शिकायत की गंभीरता के अनुरूप जांच होनी चाहिए।
महोबा में विधायक निधि से कराए गए कार्यों पर उठ रहे सवालों का समाधान आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि दस्तावेजों, तकनीकी परीक्षण और निष्पक्ष जांच से ही संभव है। प्रशासन को चाहिए कि वह शिकायतों का विवरण, जांच की स्थिति और कार्रवाई का परिणाम सामने रखे। यदि कहीं ठेकेदारों ने नियमों की अनदेखी की है या निगरानी में लापरवाही बरती गई है, तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।
अब सबसे अहम सवाल यही है—क्या महोबा में विधायक निधि से कराए गए विवादित निर्माण कार्यों की स्वतंत्र तकनीकी जांच होगी और क्या शिकायतों के निस्तारण का धरातलीय सत्यापन कराया जाएगा? जनता को आश्वासन नहीं, बल्कि गुणवत्तापूर्ण निर्माण और सार्वजनिक धन के उपयोग का स्पष्ट हिसाब चाहिए।






