महोबा के जिला पुरुष अस्पताल की ओपीडी में इलाज को लेकर सवाल, डॉ. साजिद अली की कार्यप्रणाली की जांच की मांग

महोबा के जिला पुरुष अस्पताल की ओपीडी में इलाज को लेकर सवाल, डॉ. साजिद अली की कार्यप्रणाली की जांच की मांग

महोबा। जिला पुरुष अस्पताल की ओपीडी में मरीजों के इलाज को लेकर गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं। अस्पताल के ओपीडी नंबर-4 में बाल रोग विशेषज्ञ के रूप में इलाज करने वाले डॉ. साजिद अली को लेकर मरीजों और तीमारदारों की ओर से कई तरह की शिकायतें सामने आने की बात कही जा रही है। आरोपों में बाहर की दवाएं लिखने, जांच के लिए मरीजों को बाहर भेजने, सरकारी नियमों और निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं करने तथा मरीजों और तीमारदारों से कथित अभद्र व्यवहार जैसे बिंदु शामिल हैं।

हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र और आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है। ऐसे में पूरे मामले की निष्पक्ष जांच जरूरी है। खासकर चिकित्सक की शैक्षिक योग्यता, मेडिकल पंजीकरण, विशेषज्ञता की अतिरिक्त योग्यता और अस्पताल में उनकी नियुक्ति से संबंधित दस्तावेजों का सत्यापन कराया जाना चाहिए।

मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि जिला अस्पताल में पहुंचने वाला बड़ा वर्ग आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से आता है। ऐसे मरीज सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं पर निर्भर रहते हैं। यदि उन्हें इलाज के दौरान बाहर से महंगी दवाएं या जांच कराने की सलाह दी जाती है तो इसका सीधा असर उनके परिवार की जेब पर पड़ता है।

ओपीडी नंबर चार में बैठते हैं चिकित्सक

जानकारी के अनुसार डॉ. साजिद अली जिला पुरुष अस्पताल की ओपीडी संख्या चार में मरीजों का उपचार करते हैं। यहां प्रतिदिन बड़ी संख्या में मरीज उपचार और चिकित्सकीय सलाह के लिए पहुंचते हैं। बच्चों को लेकर आने वाले माता-पिता और तीमारदार डॉक्टर की सलाह को महत्वपूर्ण मानते हैं।

ऐसे में सवाल यह है कि ओपीडी में लिखी जाने वाली दवाओं और जांचों की नियमित समीक्षा होती है या नहीं? अस्पताल में उपलब्ध दवाओं की सूची और डॉक्टर द्वारा लिखी गई दवाओं का मिलान कराया जाता है या नहीं? यदि कोई जांच अस्पताल में उपलब्ध है तो मरीज को बाहर जांच कराने की सलाह किन परिस्थितियों में दी जाती है?

इन सवालों का जवाब केवल दस्तावेजों की जांच से ही सामने आ सकता है।

बाहर की दवाओं के आरोप, रिकॉर्ड से खुलेगा राज

मरीजों की ओर से लगाए जा रहे आरोपों में एक प्रमुख बिंदु बाहर से दवा खरीदने का भी है। यदि किसी मरीज को अस्पताल में उपलब्ध दवा के स्थान पर बाहर की दवा लिखी गई है तो संबंधित पर्चे की जांच की जा सकती है।

इसके लिए स्वास्थ्य विभाग को पिछले कई महीनों के ओपीडी प्रिस्क्रिप्शन की जांच करनी चाहिए। पर्चियों में लिखी दवाओं को अस्पताल के दवा स्टोर के स्टॉक रजिस्टर से मिलाया जाए। जिस दिन संबंधित दवा अस्पताल में उपलब्ध थी, उस दिन मरीज को वही दवा क्यों नहीं दी गई, इसका कारण भी रिकॉर्ड में देखा जा सकता है।

अगर दवा अस्पताल में उपलब्ध ही नहीं थी तो मामला अलग है। लेकिन यदि दवा उपलब्ध होने के बावजूद लगातार बाहर की दवाएं लिखे जाने का पैटर्न मिलता है तो स्वास्थ्य विभाग को इसका कारण जानना चाहिए।

यही जांच आरोप और तथ्य के बीच का अंतर स्पष्ट कर सकती है।

बाहर जांच कराने की सलाह पर भी उठे सवाल

मरीजों और तीमारदारों की ओर से जांच के लिए बाहर भेजे जाने को लेकर भी सवाल उठाए जाने की बात कही जा रही है। यहां भी केवल आरोप के आधार पर निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।

स्वास्थ्य विभाग को देखना चाहिए कि संबंधित जांच अस्पताल में उपलब्ध थी या नहीं। यदि सुविधा उपलब्ध थी तो मरीज को बाहर भेजने का चिकित्सकीय कारण क्या था? यदि सुविधा उपलब्ध नहीं थी तो अस्पताल में उस जांच की व्यवस्था क्यों नहीं थी?

इस संबंध में मरीज की पर्ची, जांच रिपोर्ट, अस्पताल की लैब सुविधा और संबंधित दिन की उपलब्धता का रिकॉर्ड महत्वपूर्ण हो सकता है।

सरकारी नियमों और प्रक्रिया की जांच जरूरी

शिकायतों में सरकारी नियमों के तहत कथित रूप से डीटीयू नहीं करने का मुद्दा भी उठाया जा रहा है। इस मामले में सबसे पहले यह स्पष्ट किया जाना आवश्यक है कि संबंधित स्थिति में डीटीयू से आशय क्या है और उसके संबंध में विभागीय नियम या मानक प्रक्रिया क्या निर्धारित है।

यदि कोई प्रक्रिया सरकारी आदेश के तहत अनिवार्य है और उसका पालन नहीं किया गया तो जिम्मेदारी तय करने के लिए जांच की जा सकती है। दूसरी ओर यदि संबंधित प्रक्रिया उस मामले में लागू ही नहीं थी तो शिकायत की स्थिति भी स्पष्ट हो जाएगी।

इसलिए स्वास्थ्य विभाग को संबंधित शासनादेश, विभागीय दिशा-निर्देश और अस्पताल के रिकॉर्ड को सामने रखकर जांच करनी चाहिए।

डिग्री और विशेषज्ञता के दस्तावेजों की हो जांच

पूरे मामले में सबसे संवेदनशील सवाल चिकित्सक की डिग्री, डिप्लोमा और विशेषज्ञता को लेकर उठाए जा रहे हैं। किसी चिकित्सक की डिग्री पर सवाल उठाना गंभीर विषय है। इसलिए बिना आधिकारिक दस्तावेज के किसी डिग्री को फर्जी या संदिग्ध बताना उचित नहीं होगा।

लेकिन यदि शिकायत सामने आई है तो दस्तावेजों का सत्यापन कराने में कोई बाधा नहीं होनी चाहिए।

स्वास्थ्य विभाग को डॉ. साजिद अली की—

एमबीबीएस डिग्री,

मेडिकल रजिस्ट्रेशन,

बाल रोग विशेषज्ञता संबंधी डिग्री या डिप्लोमा,

अतिरिक्त योग्यता का पंजीकरण,

संबंधित मेडिकल संस्थान से प्रमाणपत्र,

नियुक्ति के समय प्रस्तुत शैक्षिक दस्तावेज

का सत्यापन कराना चाहिए।

उत्तर प्रदेश मेडिकल काउंसिल की ऑनलाइन व्यवस्था में चिकित्सकों के पंजीकरण और अतिरिक्त योग्यता संबंधी सेवाएं उपलब्ध हैं।

इसलिए यदि दस्तावेज सही हैं तो आधिकारिक सत्यापन से उठ रहे सवालों का जवाब मिल सकता है और यदि किसी दस्तावेज में विसंगति मिलती है तो संबंधित प्राधिकारी नियमानुसार आगे की कार्रवाई कर सकता है।

मरीजों से व्यवहार भी जांच का विषय

इलाज के साथ मरीजों के साथ डॉक्टर और स्टाफ का व्यवहार भी स्वास्थ्य व्यवस्था का अहम हिस्सा है। आरोप है कि कुछ मरीजों और तीमारदारों के साथ कथित तौर पर अभद्र या दबावपूर्ण व्यवहार किया जाता है।

इन आरोपों की जांच के लिए अस्पताल प्रशासन मरीजों की लिखित शिकायतें, शिकायत रजिस्टर, उपलब्ध सीसीटीवी फुटेज और संबंधित कर्मचारियों व प्रत्यक्षदर्शियों के बयान देख सकता है।

यदि कोई लिखित शिकायत पहले दी गई है तो यह भी देखा जाना चाहिए कि उस पर अस्पताल प्रशासन ने क्या कार्रवाई की।

छह महीने के रिकॉर्ड का हो ऑडिट

यदि स्वास्थ्य विभाग वास्तव में पूरे मामले की तह तक जाना चाहता है तो केवल एक-दो मरीजों से पूछताछ पर्याप्त नहीं होगी। पिछले छह से 12 महीने का रिकॉर्ड निकाला जाना चाहिए।

जांच में—

ओपीडी रजिस्टर → मरीज की पर्ची → लिखी गई दवा → अस्पताल में उपलब्ध दवा → जांच की सलाह → अस्पताल की जांच सुविधा → बाहर की जांच → मरीज की रिपोर्ट

का मिलान किया जा सकता है।

इससे यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि शिकायतें किसी एक घटना से जुड़ी हैं या किसी लगातार चल रहे पैटर्न की ओर इशारा करती हैं।

सीएमओ और अस्पताल प्रशासन से जवाब जरूरी

पूरे प्रकरण में स्वास्थ्य विभाग से कई सवालों के जवाब अपेक्षित हैं।

क्या डॉ. साजिद अली की सभी शैक्षिक योग्यताओं का सत्यापन हुआ है?

क्या बाल रोग विशेषज्ञ के रूप में उनकी अतिरिक्त योग्यता का मेडिकल काउंसिल में पंजीकरण है?

ओपीडी नंबर चार में उनके द्वारा लिखे जा रहे प्रिस्क्रिप्शन का कभी ऑडिट हुआ?

अस्पताल में उपलब्ध दवाओं और उनके प्रिस्क्रिप्शन का मिलान किया गया?

बाहर से जांच कराने की शिकायतों की जांच हुई?

डीटीयू से संबंधित सरकारी प्रोटोकॉल क्या है?

मरीजों के व्यवहार से संबंधित कोई लिखित शिकायत मिली?

यदि शिकायत मिली तो उस पर क्या कार्रवाई हुई?

इन सवालों के जवाब सामने आने से ही तस्वीर साफ होगी।

शिकायत सही है तो कार्रवाई, गलत है तो स्थिति भी साफ हो

मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात निष्पक्ष जांच है। किसी डॉक्टर को केवल आरोपों के आधार पर दोषी ठहराना उचित नहीं है। लेकिन शिकायतों को नजरअंदाज करना भी मरीजों के हित में नहीं होगा।

यदि जांच में आरोप प्रमाणित होते हैं तो संबंधित नियमों के तहत कार्रवाई होनी चाहिए। यदि आरोप प्रमाणित नहीं होते हैं तो स्वास्थ्य विभाग को जांच के निष्कर्ष सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करने चाहिए, ताकि चिकित्सक के खिलाफ लगाए जा रहे सवालों का भी तथ्यात्मक जवाब मिल सके।

जिला पुरुष अस्पताल के ओपीडी नंबर चार में इलाज कराने वाले मरीजों का हित सबसे ऊपर होना चाहिए।

सरकारी अस्पताल में आने वाला गरीब मरीज न तो अनावश्यक आर्थिक बोझ उठाने की स्थिति में होता है और न ही स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़े सवालों के लिए दर-दर भटकने की।

अब देखना यह है कि महोबा स्वास्थ्य विभाग इन शिकायतों को महज आरोप मानकर छोड़ता है या फिर दवा, जांच, प्रिस्क्रिप्शन, सरकारी प्रोटोकॉल और डॉक्टर की शैक्षिक योग्यता—सभी बिंदुओं की दस्तावेजी जांच कराकर वास्तविकता सामने लाता है।

क्योंकि इस पूरे मामले में फैसला आरोपों से नहीं, रिकॉर्ड और आधिकारिक जांच से होना चाहिए।

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