नाम बड़े, दर्शन छोटे!
किशोरी के अपहरण की शिकायत, चौकी से एसपी कार्यालय और विधायक की चौखट तक पहुंचा परिवार, फिर भी कार्रवाई का इंतजार
राजीव तिवारी की कलम से खास विश्लेषण
महोबा। सत्ता, सियासत और पुलिस प्रशासन के बीच आम आदमी की फरियाद आखिर कहां सुनी जाए? यह सवाल महोबा जनपद के चरखारी कोतवाली क्षेत्र के एक गांव से सामने आए एक मामले ने फिर खड़ा कर दिया है। पीड़ित परिवार का आरोप है कि उनकी किशोरी को दिनदहाड़े ले जाने के मामले में उन्होंने पहले स्थानीय पुलिस चौकी, फिर कोतवाली चरखारी और इसके बाद पुलिस अधीक्षक के समक्ष नामजद शिकायतें दीं, लेकिन कार्रवाई आगे नहीं बढ़ सकी। परिवार का कहना है कि उसे अपनी बेटी के अपहरण की आशंका जताते हुए लगातार पुलिस से कार्रवाई और बरामदगी की गुहार लगानी पड़ी।
मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि किसी परिवार की किशोरी अचानक घर से चली जाती है और परिजन नामजद लोगों पर उसे ले जाने का आरोप लगाते हुए लिखित शिकायत देते हैं, तो पुलिस उस शिकायत की गंभीरता से जांच कब और कैसे करेगी? क्या किसी युवती की उम्र को लेकर विवाद सामने आने के बाद पूरे मामले की जांच की दिशा ही बदल जाएगी? क्या उम्र संबंधी दस्तावेज की जांच के साथ-साथ घटनास्थल, कॉल डिटेल, सीसीटीवी, मोबाइल लोकेशन, प्रत्यक्षदर्शियों और नामजद लोगों की भूमिका की जांच नहीं होनी चाहिए?
पीड़ित परिवार के अनुसार घटना के बाद सबसे पहले स्थानीय पुलिस चौकी में शिकायत दी गई। परिवार का दावा है कि शिकायत में नामजद लोगों के विरुद्ध कार्रवाई की मांग की गई थी, लेकिन उसे अपेक्षित कार्रवाई नहीं मिली। इसके बाद परिवार कोतवाली चरखारी पहुंचा और वहां भी नामजद शिकायत दी। आरोप है कि यहां भी मामला कार्रवाई के बजाय इंतजार में पड़ा रहा।
जब स्थानीय स्तर पर सुनवाई नहीं हुई तो परिवार ने पुलिस अधीक्षक के कार्यालय की चौखट पर पहुंचकर अपनी फरियाद रखी। पीड़ित परिवार का आरोप है कि वहां भी शिकायत देने के बावजूद उसे वह कार्रवाई दिखाई नहीं दी, जिसकी वह उम्मीद कर रहा था। परिवार के मुताबिक पुलिस की ओर से यह कहा गया कि किशोरी बालिग है और मामले में गुमशुदगी दर्ज की गई है।
यहीं से पूरा मामला कई गंभीर सवाल खड़े करता है।
बालिग होना जांच का अंत या शुरुआत?
यदि पुलिस के अनुसार किशोरी बालिग है, तो उसकी उम्र का सत्यापन अपने आप में एक महत्वपूर्ण जांच बिंदु है। लेकिन परिवार द्वारा नामजद लोगों पर गंभीर आरोप लगाए जाने के बाद पुलिस के सामने केवल उम्र का सवाल नहीं, बल्कि घटनाक्रम की पूरी परिस्थितियों की जांच का प्रश्न भी है।
किशोरी कहां गई? किसके साथ गई? क्या वह अपनी इच्छा से गई? क्या उसे बहला-फुसलाकर ले जाया गया? परिवार द्वारा लगाए गए आरोपों में कितनी सच्चाई है? नामजद लोगों की भूमिका क्या है? घटना के समय उनके मोबाइल नंबरों की लोकेशन क्या थी? आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों में क्या सामने आया? इन सवालों का जवाब जांच से ही मिल सकता है।
पीड़ित परिवार का कहना है कि उसकी शिकायत को केवल इस आधार पर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए कि किशोरी बालिग है। परिवार का दावा है कि यदि उनकी शिकायत में तथ्य हैं तो पुलिस को निष्पक्ष जांच के माध्यम से सच्चाई सामने लानी चाहिए।
एसपी की चौखट के बाद विधायक के दरवाजे पर पहुंचा परिवार
लगातार शिकायतों के बावजूद सुनवाई न होने का आरोप लगाते हुए पीड़ित परिवार आखिरकार अपने क्षेत्र के विधायक ब्रजभूषण राजपूत उर्फ गुड्डू के पास पहुंचा। परिवार को उम्मीद थी कि जनप्रतिनिधि के हस्तक्षेप से पुलिस प्रशासन मामले को गंभीरता से लेगा और उनकी बेटी के संबंध में सच्चाई सामने आएगी।
पीड़ित परिवार के अनुसार विधायक ने स्थानीय कोतवाली चरखारी के प्रभारी को फोन कर मामले की जानकारी दी और महिला संबंधी प्रकरण होने के कारण कार्रवाई करने की बात कही।
अब सवाल यह है कि यदि जनप्रतिनिधि ने पुलिस अधिकारी से कार्रवाई के लिए कहा था तो उसके बाद पुलिस स्तर पर क्या कदम उठाए गए? क्या शिकायत की दोबारा समीक्षा हुई? क्या नामजद लोगों से पूछताछ हुई? क्या किशोरी के बयान कराए गए? क्या उसके सुरक्षित होने की पुष्टि की गई? क्या परिवार को जांच की प्रगति की जानकारी दी गई?
इन सवालों के जवाब सार्वजनिक होना जरूरी हैं।
मुख्यमंत्री पोर्टल तक पहुंची फरियाद, निस्तारण पर भी सवाल
स्थानीय स्तर से लेकर पुलिस अधीक्षक तक शिकायत के बाद भी समाधान न मिलने का आरोप लगाते हुए पीड़ित परिवार ने मुख्यमंत्री पोर्टल पर भी शिकायत की। अब इस शिकायत के निस्तारण को लेकर भी परिवार को आशंका है।
सरकारी शिकायत प्रणाली का उद्देश्य केवल शिकायत संख्या पैदा करना या निस्तारण का आंकड़ा बढ़ाना नहीं, बल्कि पीड़ित को वास्तविक राहत उपलब्ध कराना है। यदि किसी शिकायत का निस्तारण केवल कागजी जवाब के आधार पर कर दिया जाए और मूल समस्या जस की तस रह जाए, तो ऐसी व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
यहां जांच का एक अहम पहलू यह भी होना चाहिए कि मुख्यमंत्री पोर्टल पर दर्ज शिकायत का निस्तारण किस अधिकारी ने किया, मौके पर क्या जांच की गई, शिकायतकर्ता के बयान लिए गए या नहीं, किशोरी के संबंध में वास्तविक स्थिति क्या पाई गई और नामजद आरोपों की जांच किस स्तर तक पहुंची।
पुलिस के सामने सबसे बड़ा सवाल—कहां है किशोरी और क्या है पूरा सच?
इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण केंद्र किशोरी की सुरक्षा और उसकी वास्तविक स्थिति है। परिवार अपनी बेटी के अपहरण की आशंका जता रहा है, जबकि पुलिस की ओर से उसके बालिग होने और गुमशुदगी के रूप में मामले को देखने की बात सामने आ रही है।
दोनों दावों के बीच सच्चाई तक पहुंचने की जिम्मेदारी पुलिस की है।
न तो परिवार के आरोपों को बिना जांच के सत्य माना जा सकता है और न ही आरोपों को केवल उम्र के विवाद के आधार पर खारिज किया जा सकता है। निष्पक्ष जांच ही वह रास्ता है, जिससे सामने आ सकता है कि घटना वास्तव में क्या थी।
जनप्रतिनिधि की सिफारिश के बाद भी कार्रवाई नहीं तो फिर जनता जाए कहां?
लोकतंत्र में विधायक जनता का प्रतिनिधि होता है। जनता अपने प्रतिनिधि को इसलिए चुनती है कि जरूरत पड़ने पर वह उसकी आवाज शासन-प्रशासन तक पहुंचाए। लेकिन यदि कोई पीड़ित परिवार पुलिस चौकी, थाना, एसपी कार्यालय और फिर विधायक तक पहुंचने के बाद भी कार्रवाई का इंतजार करता रहे तो सवाल केवल एक परिवार का नहीं रह जाता।
सवाल व्यवस्था का बन जाता है।
करोड़ों रुपये खर्च कर पुलिस चौकियां और थाने इसलिए बनाए जाते हैं कि शिकायतकर्ता को न्याय की दिशा में आगे बढ़ाया जा सके। पुलिस व्यवस्था का मूल उद्देश्य ही कानून के अनुसार निष्पक्ष जांच और नागरिकों की सुरक्षा है। इसी तरह विधायक को जनता अपना प्रतिनिधि बनाती है ताकि उसकी आवाज सत्ता और प्रशासन के सामने मजबूती से रखी जा सके।
फिर सवाल यह है कि पीड़ित परिवार की फरियाद आखिर किस दरवाजे पर जाकर पूरी होगी?
‘नाम बड़े, दर्शन छोटे’ की चर्चा क्यों?
मामले ने राजनीतिक और प्रशासनिक जवाबदेही दोनों पर सवाल खड़े किए हैं। चुनावी मौसम की आहट के साथ राजनीतिक दल जनता के बीच अपनी मौजूदगी दर्ज कराने में जुटे हैं। बड़े-बड़े कार्यक्रम, प्रदर्शन, जनसभाएं और जनहित के दावे राजनीतिक मंचों पर दिखाई दे रहे हैं। लेकिन जब किसी परिवार को अपनी बेटी के संबंध में न्याय की तलाश में एक कार्यालय से दूसरे कार्यालय तक जाना पड़े, तब उन दावों की वास्तविक परीक्षा होती है।
पीड़ित परिवार की पीड़ा यही है कि उसने हर संभव दरवाजा खटखटाया, लेकिन उसे अभी तक वह संतोषजनक जवाब नहीं मिला जिसकी उसे उम्मीद थी।
अगर विधायक के हस्तक्षेप के बाद भी मामले की जांच में तेजी नहीं आई तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि जनप्रतिनिधि की बात का प्रशासनिक स्तर पर कितना असर है।
और यदि पुलिस ने नियमानुसार जांच की है तो उसे सामने रखने में हिचक क्यों?
जांच हो तो इन सवालों के जवाब मिल सकते हैं
इस प्रकरण में निष्पक्ष जांच के लिए घटनाक्रम की समयरेखा तैयार करना बेहद जरूरी है। पहली शिकायत कब दी गई? उसमें क्या आरोप लगाए गए? शिकायत पर पुलिस ने क्या कार्रवाई की? दूसरी शिकायत कब दी गई? एसपी कार्यालय में शिकायत के बाद क्या निर्देश हुए? विधायक द्वारा कोतवाल से बात करने के बाद क्या कार्रवाई की गई? मुख्यमंत्री पोर्टल की शिकायत किस अधिकारी के पास गई और उसका निस्तारण किस आधार पर हुआ?
इसके अलावा किशोरी की उम्र संबंधी दस्तावेज, मोबाइल फोन और डिजिटल साक्ष्य, संभावित सीसीटीवी फुटेज, कॉल डिटेल, संबंधित लोगों के बयान तथा यात्रा के संभावित मार्ग की जांच से भी मामले की वास्तविकता सामने आ सकती है।
यदि किशोरी अपनी इच्छा से गई है तो भी उसका सुरक्षित होना और उसका स्वतंत्र बयान महत्वपूर्ण है। यदि परिवार के आरोप सही पाए जाते हैं तो कानून के अनुसार जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई होनी चाहिए। और यदि आरोपों में तथ्य नहीं पाए जाते हैं तो जांच के आधार पर वास्तविक स्थिति परिवार के सामने स्पष्ट की जानी चाहिए।
अब गेंद पुलिस प्रशासन के पाले में
यह मामला केवल एक शिकायत का निस्तारण नहीं है। यह उस भरोसे की परीक्षा है जो एक आम नागरिक पुलिस और जनप्रतिनिधि पर करता है।
पीड़ित परिवार के आरोप सही हैं या नहीं, इसका फैसला जांच से ही होगा। लेकिन इतना जरूर है कि एक परिवार द्वारा बार-बार अलग-अलग स्तरों पर शिकायत किए जाने के बाद मामले की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच की जरूरत बढ़ जाती है।
पुलिस प्रशासन को स्पष्ट करना चाहिए कि शिकायत पर अब तक क्या कार्रवाई हुई, किशोरी की वर्तमान स्थिति क्या है, उसकी उम्र का सत्यापन किस आधार पर हुआ, नामजद लोगों की भूमिका की जांच हुई या नहीं और मुख्यमंत्री पोर्टल की शिकायत का निस्तारण किन तथ्यों के आधार पर किया गया।
जनप्रतिनिधि को भी बताना चाहिए कि शिकायतकर्ता के पहुंचने के बाद पुलिस से क्या कार्रवाई रिपोर्ट मांगी गई और पीड़ित परिवार को क्या जानकारी उपलब्ध कराई गई।
क्योंकि सवाल सिर्फ एक किशोरी का नहीं है। सवाल उस भरोसे का है, जिसके सहारे जनता थाने की चौखट पर पहुंचती है, एसपी कार्यालय जाती है और फिर अपने जनप्रतिनिधि के दरवाजे पर दस्तक देती है।
अगर हर दरवाजे पर शिकायत दर्ज होने के बाद भी पीड़ित को केवल आश्वासन ही मिले, तो फिर जनता पूछेगी—न्याय मिलेगा कहां?
और इसी सवाल के बीच महोबा की इस घटना में एक बात बेहद तल्ख होकर सामने आती है





